प्रेम

कइयों से कहते सुना है, वास्तविक प्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती। प्रेम मात्र शरीर के भीतर होने वाली रासायनिक प्रक्रिया है।
जब किसी का सच्चा प्यार टूटता है तो वह रोता है, चीखता है, छटपटाता है फिर समय के साथ धीरे-धीरे स्थिर हो जाता है, सारी भावनाएँ थिथिल हो जाती हैं। तब या तो वह सारी ज़िंदगी बेचैन रहता है या फिर शुन्य हो जाता है। समय उस आघात से लड़ने की शक्ति देता है या कह सकते हैं की हम समय के आगे लाचार हो जाते हैं।
तो क्या समय के साथ प्रेम समाप्त हो जाता है?
नहीं, मैंने कहा भावनाएँ थिथिल हो जाती हैं...मरती नहीं। प्रेम सत्य है और सत्य कभी मरता नहीं। वास्तविक प्रेम अनंत काल के लिए होता है।
ये विचार जीवन भर ज्वार और भाटे की भांति हमारे मस्तिष्क में उथल-पुथल मचाते हैं। पर अगर मन स्थिर हो तो ये विचार हमें परमानंद की अनुभूति कराते हैं।
कल्पना कीजिये, आपकी उम्र इस वक्त सत्तर साल है और आप एकांत में अपने प्रेम के साथ बिताए प्यारे क्षणों को याद कर रहे हैं। वो प्रेम जिसके साथ आपने अपने जीवन के सबसे सुन्दर समय बिताये। जीवन के सभी कड़वे अनुभवो पर वो कुछ क्षण भारी हैं.... वो प्रेम के क्षण। तब आप अनुभव करेंगे, आप दुनिया के सबसे खुशकिस्मत लोगों में से एक हैं। आप तब विजेता बन जाते हैं जब आपका प्रेम शारीरिक न होकर आत्मिक है।
आप खुशियाँ मनाइये, क्योंकी जिसने आपके प्रेमी के शरीर को पाया है वो हार चूका है। आपने आत्मा पर विजय प्राप्त की है। आत्मा अमर है। आपका प्रेम अमर है।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः
(पुष्कर)

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पुनर्निवास

दो वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन अपनी बात एक कागज़ पर लिखी थी सोचा साझा कर दूँ। ------------------------------------------------- ...