पुनर्निवास

ganga ghats




दो वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन अपनी बात एक कागज़ पर लिखी थी सोचा साझा कर दूँ।
-------------------------------------------------

कहते हैं दुनिया गोल है, आदमी कहीं से भी चले वापस उसी जगह पर पहुंचता है। हमें ज़िन्दगी में कई किताबी बातें अक्सर सच होते दिखलाई पड़ती हैं। कई चीजे ऐसी होती हैं जो कभी नहीं बदलती, उनका स्वरुप चीर काल तक एक सा होता है।

आज करीब आठ साल बाद मैंने पतंगों की डोर थामी, वो पतंग की डोर ना थी जैसे ज़िन्दगी की डोर थी। एक एहसास, की कई चीजे बदलती नहीं।
कहा बदला बनारस!! यह आज भी वैसा ही है, जैसा बचपन में हुआ करता था। पतंगबाज़ी का वही जूनून, पुरानी यादो को ताज़ा करते छतों पर बजते उदित नारायण और कुमार सानु के गाने। यहाँ हनी सिंह और बादशाह को कोई नहीं जानता, बच्चे आज भी शैतानियाँ करते हैं, यहाँ आज भी गालियों का आदान-प्रदान थोक के भाव में होता है।
कहाँ बदला बनारस!!
कहते हैं हमारे ब्रह्माण्ड में कहीं कोई ऐसी जगह है जहा वक्त रुक जाता है, शायद वह बनारस है।
बनारस..... वही घाट, वही गलियां, चूरन और पाचक की वही दुकाने जहा बच्चो का जमावड़ा लगा होता है। यहाँ आधुनिकता हावी नहीं हो सकती, क्यों की यहाँ आकर आपकी आत्मा भी बनारसी हो जाती है।
यह बात सिर्फ एक शहर की नहीं है, यह बात है इस शहर से जुड़े यादों की, इस शहर से जुड़े आत्मीय लगाव की। बनारस नहीं बदल सकता क्योंकि इसकी संस्कृति रुपी आत्मा इतनी निर्बल नहीं।

No comments:

Post a Comment

पुनर्निवास

दो वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन अपनी बात एक कागज़ पर लिखी थी सोचा साझा कर दूँ। ------------------------------------------------- ...