मेरी कल्पना

जब मैं 11 वीं क्लास में था तो मैंने अपने जीवन की पहली रोमैन्टिक कविता लिखी थी। तब लोगो ने उसे पढ़ कर मुझसे यह प्रश्न किया था की कोई इतनी कम उम्र में ऐसी प्रेम कविताएँ कैसे लिख सकता है। पहली दफ़ा तो उन्हें यह लगा की संभवतः यह मेरी अपनी कविता नहीं है, मैं किसी और की कविता को अपनी कह रहा हूँ।
जबकि खुद के अंदर किसी भी तरह की भावनाएं समेटने को कोई तय उम्र नहीं होती। कोई भी आदमी किसी भी उम्र में कुछ भी कर सकता है। कब किसके अंदर किस तरह की जिज्ञासा जाग जाए ये कोई नहीं जानता।
प्रस्तुत है वो कविता जिसे मैंने शीर्षक दिया था "मेरी कल्पना"

मैं डूब जाता हूँ तेरी आँखों में
वो सागर की गहराई है
या शहद का आकर्षण
मैं नहीं जानता।
मैं भंवरा हूँ या मांझी
मैं नहीं जानता।
तेरे भौं से निकले तीर,
मेरे दिल को चुभोते हैं।
फिर भी ये दर्द,
मुझे प्यारा क्यों लगता है ?
मैं नहीं जानता।
मेरी नज़रें फ़िसल जाती हैं
तेरे संगमरमर से बदन पर।
चांदनी रात को तू
जब छत पर टहलती है
तो चाँद भी शरमा जाता है।
जी चाहता है तुझे देखता रहूँ
समाज की जंज़ीरें मुझे जकड़ती हैं
मैं उन्हें तोड़ता हूँ बार-बार
क्यों ?
मैं नहीं जानता।
(पुष्कर)

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दो वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन अपनी बात एक कागज़ पर लिखी थी सोचा साझा कर दूँ। ------------------------------------------------- ...