मेरे बचपन का शुरुआती साल मामा गाँव में बीता। मेरा मामा गाँव बिहार के रोहतास जिले में है। बचपन की बहुत सारी यादें हैं जिन्हें मैं कभी भूल नहीं सकता। उस
सफ़ेद गाय के दूध का स्वाद, पुआल की गंध, आम का पेंड, नाना का प्यार और न जाने क्या-क्या। न जाने क्या-क्या.....
मेरे मामा गाँव में बिताए गए पल, जीवन के सबसे खूबसूरत पलों में से एक हैं। खैर!! दुःख की बात ये है की अब ना ही वो सफ़ेद गाय है, ना ही वो आम का पेंड और ना ही नाना। नाना जी को दुनियाँ छोड़े और मुझे मामा गाँव गए करीब पंद्रह साल हो चुके हैं, और अब सिर्फ यादें बाकी हैं।
जब भी मैं अपने गाँव आता हूँ जो की बिहार के बक्सर जिले में स्थित है तो अनायास ही मुझे अपने मामा गाँव की याद आ जाती है। गाँव तो गाँव होता है, चाहें वो मामा गाँव हो या अपना पुस्तैनी गाँव। फिर भी ना जाने क्यों आज भी मुझे अपने मामा गाँव की बहुत याद आती है। जब भी कोई आम का पेंड देखता हूँ तो मुझे याद आता है की कैसे गर्मी के मौसम में जब लू चलती थी तो हम सबसे छिप कर आम बटोरने भाग जाया करते थे। उस सफ़ेद गाय को तो कभी भूल ही नहीं सकता...बहुत सीधी थी बेचारी, मेरे नाना अपनी बेटी की तरह मानते थे उसे। उन पुआल के टीलों को कैसे भूल सकता हूँ ?? धान की कटाई के बाद जमा हुए पुआल पर खेलना, उनके टीलों से कूद कर खुद को कोई फ़िल्मी हीरो समझना। ये शहरी लोग क्या जाने गाँव में रहने का आनंद।
गाँव कितना प्यारा होता है न!! वहाँ कोई शहरी सुविधा नहीं होती, फिर भी एक अपनापन होता है। कहते है, गाँव के लोगों की तरह गाँव के रिश्ते भी बहुत मज़बूत होते हैं। शहर की ज़हरीली हवा से पुआल की गंध कहीं बेहतर है।
हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं पर अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिये। जो अपनी जड़ों को याद रखता है, वक़्त की आंधी उसे कभीं नहीं उखाड़ पाती।
सफ़ेद गाय के दूध का स्वाद, पुआल की गंध, आम का पेंड, नाना का प्यार और न जाने क्या-क्या। न जाने क्या-क्या.....
मेरे मामा गाँव में बिताए गए पल, जीवन के सबसे खूबसूरत पलों में से एक हैं। खैर!! दुःख की बात ये है की अब ना ही वो सफ़ेद गाय है, ना ही वो आम का पेंड और ना ही नाना। नाना जी को दुनियाँ छोड़े और मुझे मामा गाँव गए करीब पंद्रह साल हो चुके हैं, और अब सिर्फ यादें बाकी हैं।
जब भी मैं अपने गाँव आता हूँ जो की बिहार के बक्सर जिले में स्थित है तो अनायास ही मुझे अपने मामा गाँव की याद आ जाती है। गाँव तो गाँव होता है, चाहें वो मामा गाँव हो या अपना पुस्तैनी गाँव। फिर भी ना जाने क्यों आज भी मुझे अपने मामा गाँव की बहुत याद आती है। जब भी कोई आम का पेंड देखता हूँ तो मुझे याद आता है की कैसे गर्मी के मौसम में जब लू चलती थी तो हम सबसे छिप कर आम बटोरने भाग जाया करते थे। उस सफ़ेद गाय को तो कभी भूल ही नहीं सकता...बहुत सीधी थी बेचारी, मेरे नाना अपनी बेटी की तरह मानते थे उसे। उन पुआल के टीलों को कैसे भूल सकता हूँ ?? धान की कटाई के बाद जमा हुए पुआल पर खेलना, उनके टीलों से कूद कर खुद को कोई फ़िल्मी हीरो समझना। ये शहरी लोग क्या जाने गाँव में रहने का आनंद।
गाँव कितना प्यारा होता है न!! वहाँ कोई शहरी सुविधा नहीं होती, फिर भी एक अपनापन होता है। कहते है, गाँव के लोगों की तरह गाँव के रिश्ते भी बहुत मज़बूत होते हैं। शहर की ज़हरीली हवा से पुआल की गंध कहीं बेहतर है।
हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं पर अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिये। जो अपनी जड़ों को याद रखता है, वक़्त की आंधी उसे कभीं नहीं उखाड़ पाती।


पुआल की गंध मुझे भी पसंद है
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