भक्ति

एक बात बोलूँ ?? ये जो तुम भक्त-भक्त चिल्लाते रहते हो न....ये कोई नई बात नही है। अरे भक्ति तो हमारी पुरानी परंपरा है। बल्कि हम तो कहेंगे, बिना भक्ति के हम लोग
रह ही नहीं सकते। चाहो तो लिख के दे दें तुमको।
पुराने जमाने में लोगो की भक्ति ईश्वर में हुआ करती थी और आपस में विश्वास होता था। फिर समय बदला और इंसानो को भी भगवान का दर्जा मिलने लगा। तुलसी, रहीम और कबीर के बाद लोगों ने इंसानो की पूजा शुरू कर दी। राम और कृष्ण के बाद देश में गांधी बाबा की पूजा शुरू हो गई फिर गांधी के उत्तराधिकारी नेहरु हुए।
खैर, इन सबसे अलग सिनेमा उद्योग का भी विस्तार हो रहा था। लड़कियाँ राजेश खन्ना के लिए छतों से कूद रहीं थी...। मजाल है अपने घर का लड़का किसी लड़की से नैन मटक्का कर ले !! ये हमारी परंपरा के खिलाफ था। पर राजेश खन्ना और बच्चन की सौ गलतियाँ माफ़ थीं। वो फ़िल्मो में जो करें सब कबूल था, उनके सात खून माफ़ थे। और आज भी यही हाल है।
समर्थन की पराकाष्ठा भक्ति और भक्ति की पराकाष्ठा कब अंधभक्ति बन जाती है पता ही नहीं चलता। किसी का समर्थन करने और किसी को माई-बाप बनाने में बहुत बड़ा फर्क होता है।
आज जो लोग भक्तों की आलोचना कर रहे हैं कहीं ना कहीं वो भी किसी के भक्त है। याद रहे, भक्त एक सामुदाय विशेष का नाम नहीं बल्कि एक स्वाभाव है, हम सभी भारतीयों का।

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पुनर्निवास

दो वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन अपनी बात एक कागज़ पर लिखी थी सोचा साझा कर दूँ। ------------------------------------------------- ...