भारतीय समाज का मनमौजीपन

सन् 2014 की बात है, एकता कपूर द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म आई थी "रागिनी एम.एम.एस-2"। इस फ़िल्म के मुख्य किरदार की भूमिका भूतपूर्व पोर्न स्टार "सनी लियोनी" द्वारा निभाई जा रही थी। रागिनी एम.एम.एस-2 एक "हॉरर एंड इरोटिक" फ़िल्म थी। इन सभी बातों को छोड़ कर इस फ़िल्म की एक अलग विशेषता थी, और वो थी इस फ़िल्म की शुरुआत "हनुमान चालीसा" से होना। तब इस बात पर किसी ने गौर नहीं किया और ऐसी फ़िल्म की शरुआत हनुमान चालीसा से कराने के पीछे क्या लॉजिक था, ये भी अस्पष्ट रहा।



यहाँ बात सर्फ एक फ़िल्म की नहीं है, भारत में हर फ़िल्म की शूटिंग मुहूर्त से शुरू होती है। अक्सर आपने देखा होगा की फ़िल्म के शुरू होते ही कोई धार्मिक या वैदिक मंत्र बजता है या फिर किसी देवता की मूर्ति दिखाई जाती है, चाहें वो कोई सी-ग्रेड फ़िल्म ही क्यों न हो।
सोंचने वाली बात ये है की भारत में धार्मिक भावना के नाम पर हमेशा बवाल होता रहता है, पर आज तक किसी ने भी इस विषय पर विरोध नहीं किया। पर जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया की "देश के हर सिनेमा घर में, फ़िल्म की शुरुआत से पहले राष्ट्रगान बजेगा, और इसके सम्मान में सबका अपने स्थान पर खड़ा होना अनिवार्य है", ना जाने कितने बुद्धजीवियों के कान खड़े हो गए।
भारत जैसे देश में धंधा कैसा भी हो, पर उसकी शुरुआत बिना भगवान को याद किये नहीं की जाती, और इन सभी प्रपंचो में राष्टवाद कहीं पीछे छूट गया है। कारण सिर्फ एक ही है, हमने भगवान् को सबसे आगे रखा है। एक अजीब सा डर है लोगों में। "भगवान बुरा ना मान जाएं" वाला डर। पर किसी को इस बात का डर नहीं की कहीं मेरी किसी गलत हरकत से देश को नुकसान ना पहुँच जाए।
कितनी हास्यपद बात है न!! ऐसे तो हम बैठे-बैठे भारत सरकार से पाकिस्तान पर हमला करने की मांग करते हैं और इस विषय पर नहीं सोचते की ना जाने कितने सैनिक रोज सीमा पर अपनी जान गवाँ रहे हैं। पर जब स्वयं की देशभक्ति सिद्ध करने की बारी आती है तो हम बहाने बनाते हैं या फिर सरकार को तानाशाह कह देते हैं। क्या देश के प्रति हमारी कोई जवाबदेही नहीं ? क्या सिर्फ दो मिनट के लिए राष्ट्रगान पर खड़ा होना इतना भारी काम है की इसे विरोध का मुद्दा बना दिया जाए ?  जब अपने हक़ की बारी आती है तो हम संविधान की बात करते हैं और जब भारतीय कानून हमसे हमारा कर्तव्य पूछता है तो हम उसके नियमों को ठुकरा देते हैं। क्या यह भारतीय समाज की दोहरी मानसिकता नहीं है ?
(पुष्कर रवि)

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पुनर्निवास

दो वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन अपनी बात एक कागज़ पर लिखी थी सोचा साझा कर दूँ। ------------------------------------------------- ...